अपनी मातृ भाषा हिंदी को प्रणाम
" ठंढ की शुरूआत में
सोचा, कुछ लिख दू ,
अपनी ही भाषा हिंदी
में, दिल की बात लिख दू ,
अपने ही लोगो से तिरिस्कृत,
हिंदी के जस्बात लिख दू ,
क्यों न , मैं ही अपनी
मातृभाषा में लिखने की शुरुआत कर दू ।
कुछ पल सोचा तो पाया,
हर तरफ आज भी है फैला
,
सौतेली भाषा का ही
मायाजाल ,
चाहे पत्र हो ,या हो
वार्तालाप,
या हो बैंक का हिसाब
- किताब ,
या हो न क्यों , पीपीटी
,टवीट, ईमेल
हमने तो
घर घर में पाया इंग्लैंड
का ही राज, अंग्रेजी का ही साम्राज्य ,
अपने ही लोगो ने किया
है यह काम ,
कर दिया सरेआम नीलाम,
अपना ही मान, अपना ही सम्मान ।
हिंदी के विषय में
सोचा एक बात और लिख दू ,
मन की बात पूरी तो
कह दू,
हम सबने
'हिंदी है राष्ट्र
की बिंदी' , सुना था ,
'हिंदी है हम वतन है',
भी पढ़ा था,
पर फिर भी आज कैसे,
लिखते, बोलते, संवाद
करते,
या फिर अपने ही हस्ताक्षर करते,
भूल जाते है, हम है
हिंदुस्तानी
और हिंदी हमारी मातृ
-भाषा ।
उम्मीद है बस इतनी,
और इतनी सी है आशा ,
कि पढ़ने वाला हर शक्श,
लिख दे ,कह दे ,
बता दे सब को, हिंदी
है मेरी भाषा , मेरी मातृ भाषा ।
ठंढ की शुरूआत में
सोचा, कुछ लिख दू ,
अपनी ही भाषा हिंदी
में, दिल की बात लिख दू ,"
- सुरभि भगत
अचानक दस्तख़त करते
हुए याद आया की , है तो हम हिंदुस्तानी पर आज आजादी के 68 साल बाद भी हमारी पहचान दस्तख़त
उर्फ़ सिगनेचर वही गुलामी की भाषा अंग्रेजी में है ।
आज हिंगलिश के जमाने में व्हाट्सएप्प,
gtalk पर औरों का वार्तालाप देखने का अवसर मिला तो पाया, हम चाहे टाइप इंग्लिश में
करते है पर भाषा हमारी हिंदी ही रहती है, पर
फिर भी बोलचाल की भाषा अभी तक अंग्रेजी ही बनी हुई है मानो "बच्चा अपनी
माँ को छोड़ , दूसरी महिला को कह रहा हो 'माँ दूध पिला दो '। इस परिस्थिति का एक कारण
हमारे मनोविज्ञान से है, कि हम हिंदी में बात करने, लिखने, बोलने वाले को हीनदृष्टि
से देखते हैं, और अपनी ही बात, अपने ही लोगो से कहने के लिए विदेशी जुबान अंग्रेजी
का सहारा लेते है , इस प्रयास में ना तो हम जो
कहना चाहते है, वह कह पाते है और ना ही आत्मविश्वास से बात कर पाते है , फलस्वरूप
ना हम घर के रहते है, ना ही घाट के ।
बचपन से ही मुझे अपनी मातृभाषा
हिंदी से विशेष लगाव और प्रेम रहा है, कारण
कुछ इसे भी समझा जा सकता है की बचपन से ही , घर परिवार में बोल चाल की भाषा हमेशा हिंदी
या मारवाड़ी रही और यदि हम अंग्रेजी में किट पिट करते तो अम्मा (ग्रैंड मदर) रसोई ही चिल्लाते हुए कहते , "ये आया छे लाट साहब
अंग्रेज म्हारे घर में, अबार आऊ हु "
और हम फिर से अपनी पसंदीदा भाषा हिंदी में बात करने लगते जो की हमारी अम्मा समझ सकती थी ।
बाबा (ग्रैंड फादर ) एक लेखक और हिंदी के ज्ञाता
थे, हिंदी साहित्य, काव्य, गद्य, पद्य
और विभिन्न रचनाओ को पढ़ने समझने का अवसर हमे
उनके साथ मिला । अपनी बात को सरलता से कैसे हम अपनी भाषा में कैसे व्यक्त करे इस बात
में उनका विशेष ध्यान रहता था । और यह मेरे हिंदी प्रेम का मुख्य कारण भी बना ।
अनुरोध है सबसे ,अपनी
भाषा ,पहचान को ना खोए , सब कुछ है पाया जा सकता , पर खोया मान ,सम्मान ना वापस है
आता ।